नई दिल्ली, 25/04/2026
आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ा झटका लगा, जब उसके 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में जाने का ऐलान कर दिया. इस कदम के बाद AAP ने बागी नेताओं के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत सख्त कार्रवाई करने की बात कही है और उनकी सदस्यता रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट यह जानकारी दी.
7 सांसदों ने छोड़ी पार्टी
AAP के जिन प्रमुख नेताओं ने पार्टी छोड़ी है, उनमें राघव चड्ढा सहित अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल जैसे बड़े नाम शामिल हैं. इन सभी राज्यसभा सांसदों ने न केवल पार्टी से इस्तीफा दिया, बल्कि बीजेपी में शामिल होने की घोषणा भी कर दी.
AAP का सख्त रुख
इस बगावत के बाद AAP ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सांसदों के खिलाफ कदम उठाने का ऐलान किया है. पार्टी ने राज्यसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग करेगी. AAP का कहना है कि इन सांसदों ने पार्टी के साथ विश्वासघात किया है और यह स्पष्ट रूप से दल-बदल कानून का उल्लंघन है. पार्टी चाहती है कि जल्द से जल्द इनकी सदस्यता रद्द की जाए.
क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून
भारत में दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक दलों में अनुशासन बनाए रखना और विधायकों व सांसदों द्वारा बार-बार पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना है. इस कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है. हालांकि, इसमें एक जरूरी अपवाद विलय भी है.
“दो-तिहाई” फॉर्मूला और कानूनी पेंच
इस मामले में सबसे बड़ा कानूनी मोड़ यह है कि AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद थे, जिनमें से 7 सांसदों ने एक साथ पार्टी छोड़ी है. यह संख्या दो-तिहाई से अधिक है. दल-बदल कानून के अनुसार, अगर किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं, तो इसे “विलय” माना जा सकता है. इस स्थिति में उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता. यही वजह है कि सांसद इस प्रावधान का सहारा लेकर अपनी सदस्यता बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
आगे क्या होगा
अब इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला राज्यसभा अध्यक्ष के पास होगा. उन्हें यह तय करना होगा कि यह मामला दल-बदल के तहत आता है या “विलय” के दायरे में आता है. यदि अध्यक्ष इसे दलबदल मानते हैं, तो सांसदों की सदस्यता जा सकती है. वहीं, अगर इसे वैध विलय माना जाता है तो सांसद अपनी सीट बचाने में सफल हो सकते हैं.
