चंडीगढ़, 23/05/2026
हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित आरसीबी इनोवेशन लैब इंडियन स्पोर्ट्स समिट पावर्ड बाय लीडर्स के दौरान विराट कोहली ने स्वीकार किया कि वो लंबे समय तक इम्पोस्टर सिंड्रोम से जूझते रहे. उन्होंने बताया कि लगातार कप्तानी और तीनों फॉर्मेट की जिम्मेदारियों ने उन्हें मानसिक रूप से थका दिया था. कोहली ने कहा कि वह इतने दबाव में आ गए थे कि क्रिकेट खेलने का असली आनंद ही खो गया था. अब इस पर चर्चा तेज हो गई है.
क्या होता है इम्पोस्टर सिंड्रोम?
कई बार इंसान बड़ी सफलता हासिल करने के बाद भी खुद को उस मुकाम के लायक नहीं मान पाता. अच्छे नंबर आने, प्रमोशन मिलने या लोगों की तारीफ के बावजूद मन में एक डर बना रहता है कि कहीं लोग ये ना समझ जाएं कि मैं उतना काबिल नहीं हूं. मनोविज्ञान में इसी स्थिति को इम्पोस्टर सिंड्रोम कहा जाता है.
‘ये बीमारी, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्थिति’
इस विषय को लेकर पंजाब यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजिस्ट प्रोफेसर सीमा विनायक ने बताया कि “इम्पोस्टर सिंड्रोम कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है. इसमें व्यक्ति अपनी मेहनत और क्षमता को कम आंकने लगता है. ऐसे लोग अपनी सफलता का श्रेय खुद को देने के बजाय किस्मत, मौके या दूसरों की मदद को देते हैं. उन्हें हमेशा लगता रहता है कि वे उतने योग्य नहीं हैं जितना लोग उन्हें समझते हैं.”
छात्रों और प्रोफेशनल्स में तेजी से बढ़ रही समस्या
प्रोफेसर सीमा विनायक ने बताया कि “आज के समय में ये समस्या काफी आम होती जा रही है. खासकर छात्रों, कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स, कंटेंट क्रिएटर्स और हाई अचीवर्स में ये ज्यादा देखने को मिलती है. कई रिसर्च के मुताबिक करीब 70 से 80 प्रतिशत लोग जिंदगी में कभी ना कभी इस स्थिति का सामना करते हैं. सोशल मीडिया का बढ़ता दबाव भी इसकी बड़ी वजह है. लोग लगातार अपनी तुलना दूसरों से करते रहते हैं. दूसरों की सफलता देखकर उन्हें लगता है कि वे पीछे रह गए हैं. यही तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कमजोर करने लगती है.”
कैसे पहचानें कि कोई इम्पोस्टर सिंड्रोम से जूझ रहा है?
प्रोफेसर सीमा के मुताबिक इस स्थिति से जूझ रहे लोगों में कुछ सामान्य संकेत दिखाई देते हैं. जैसे:
हर समय ओवरथिंकिंग करना
असफलता का लगातार डर
खुद को साबित करने का दबाव
छोटी गलती को भी बड़ी कमी मान लेना
हर काम में परफेक्शन चाहना
प्रोफेसर सीमा विनायक ने कहा कि “ऐसे लोग अक्सर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं हो पाते और हमेशा खुद को दूसरों से कम आंकते रहते हैं.”
इससे बाहर कैसे निकलें?
प्रोफेसर सीमा विनायक के अनुसार “सबसे जरूरी है अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करना और खुद को लगातार जज करना बंद करना. हर व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता और गलतियां होना जिंदगी का सामान्य हिस्सा है. अगर ये स्थिति लंबे समय तक बनी रहे और मानसिक सेहत पर असर डालने लगे, तो मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से सलाह जरूर लेनी चाहिए.”
