न्यूज डेस्क, 22/10/2026
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) मोदी सरकार द्वारा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान जल्दबाजी में अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश की कड़ी निंदा करता है। रुबियो 20 अक्टूबर को मुंबई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करते हैं और 22 अक्टूबर को जामनगर स्थित रिलायंस की रिफाइनरी का दौरा करते हैं। वे नई दिल्ली तक नहीं आए, क्योंकि दिल्ली एसआईआर (SIR) विरोधी संघर्षों का केंद्र बन गई है। वाशिंगटन को “उम्मीद” थी कि हमारे विदेश मंत्री उनसे मिलने जाएंगे और सरकार ने उसके निर्देश का पालन किया।
श्री रुबियो का कहना है कि समझौता “बहुत करीब” है और भारत में अमेरिकी डेयरी उत्पादों की बिक्री की अनुमति देने की मांग ही आखिरी बाधा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल कहते हैं कि “पहला हिस्सा अंतिम रूप ले चुका है”, लेकिन समझौते के मसौदे का एक पन्ना भी संसद, राज्य विधानसभाओं या जनता के सामने नहीं रखा गया है।
भारत की कनपटी पर बंदूक रखकर दबाव
सितंबर 2026 में अमेरिकी कांग्रेस ने लिंडसे ओ. ग्राहम अधिनियम (Lindsey O. Graham Act) पारित किया, जिसके तहत रूस और ईरान से तेल एवं गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जा सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों को फिलहाल रोक दिया, लेकिन इसकी कोई अंतिम समय-सीमा नहीं है और इन्हें कभी भी लागू किया जा सकता है। श्री रुबियो ने स्वीकार किया है कि व्यापार समझौते पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। यह खुलेआम साम्राज्यवादी ब्लैकमेल है। कोई भी स्वाभिमानी सरकार बंदूक की नोक पर बातचीत नहीं करती।
संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि जो सरकार ऐसे विदेश मंत्री की प्रतीक्षा में मुंबई में बैठी है, जो दिल्ली आने को तैयार नहीं है, और ऐसे समय में व्यापार समझौते पर बातचीत कर रही है, जब अमेरिकी प्रशासन उसके सिर पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लटकाए हुए है, वह बातचीत नहीं कर रही, बल्कि आदेशों का पालन करते हुए आत्मसमर्पण कर रही है। यह मुक्त व्यापार समझौता भारतीय किसानों और मेहनतकश जनता के लिए मृत्युदंड है। वे अपनी जान की बाजी लगाकर भी इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होने देंगे।
हस्ताक्षर होने से पहले ही आत्मसमर्पण
मोदी सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर होने का इंतजार भी नहीं किया है। वह पहले ही अपनी नीतियों को एक-एक करके वाशिंगटन की इच्छाओं और निर्देशों के अनुरूप झुका चुकी है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान अमेरिका से भारत का आयात 26 प्रतिशत बढ़कर 32.33 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 3 लाख करोड़ रुपये) हो गया, जबकि अमेरिका को हमारा निर्यात केवल 11 प्रतिशत बढ़ा। रसोई गैस (एलपीजी): नवंबर 2025 में भारत ने वर्ष 2026 के लिए अमेरिका से 22 लाख टन एलपीजी खरीदने का अपना पहला औपचारिक संरचित समझौता किया। जून में एक ही महीने में आयात 10 लाख टन से अधिक हो गया। तेल कंपनियों की योजना है कि 2027 में भारत की कुल एलपीजी जरूरत का एक-चौथाई तक अमेरिका से खरीदा जाए। प्राकृतिक गैस: जनवरी से जून 2026 के दौरान भारत ने रिकॉर्ड 155 अरब घन फुट अमेरिकी एलएनजी का आयात किया और अब अमेरिका हमारा सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता बन गया है। पश्चिम एशिया के युद्ध को बहाना बनाकर भारतीय रसोईघरों और उर्वरक कारखानों को अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं की निर्भरता की जंजीरों में बांधा जा रहा है। सोयाबीन: 24 सितंबर को, ठीक उसी समय जब किसान खरीफ सोयाबीन की कटाई शुरू कर रहे थे, सरकार ने कच्चे सोयाबीन और पाम तेल पर मूल आयात शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया और परिष्कृत तेलों पर भी शुल्क कम कर दिया। इससे किसानों के मंडी पहुंचने के ठीक समय सोयाबीन के दाम गिर जाएंगे, जबकि समझौते के तहत सस्ते अमेरिकी सोयाबीन तेल को भारतीय बाजार में प्रवेश देने का वादा पहले ही किया जा चुका है।
किसानों को बिक्री के लिए पेश किया जा रहा है
7 फरवरी को सहमति से तय रूपरेखा के तहत भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और अनेक कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाकर शून्य करने पर सहमत हुआ है। इनमें मक्का और ज्वार से बना पशु चारा, बादाम, अखरोट, सेब, सोयाबीन तेल और शराब शामिल हैं। भारत अमेरिकी “बाधाओं” को भी हटाने पर सहमत हुआ है, जिसका अर्थ है आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) बीजों, पशु आहार और खाद्य पदार्थों पर लागू नियमों को कमजोर करना। इसके बदले अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर अपना दंडात्मक शुल्क घटाकर केवल 18 प्रतिशत किया है। भारतीय किसानों को अमेरिका के लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये के व्यापार घाटे की भरपाई करने के लिए बलि का बकरा बनाया जा रहा है। जीएम मक्का और ज्वार से बना सस्ता अमेरिकी पशु चारा हमारे उत्पादकों के दाम गिरा देगा और खाद्य आपूर्ति व्यवस्था में जीएम सामग्री की घुसपैठ कराएगा। सस्ता सोयाबीन तेल महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के सोयाबीन किसानों को बर्बाद कर देगा। हिमालयी राज्यों के सेब और सूखे मेवे उगाने वाले किसानों पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। अमेरिका का सबसे बड़ा निशाना हमारा दूध है। जो सरकार यह छिपा रही है कि उसने क्या-क्या रियायतें दी हैं, वह यह दावा कैसे कर सकती है कि दूध “सुरक्षित” है? भारत में 8 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवार और छोटे तथा भूमिहीन परिवार, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, अपनी आजीविका के लिए सीधे डेयरी व्यवसाय पर निर्भर हैं। वे एक से तीन पशुओं के सहारे जीवनयापन करते हैं। पिछले पचास वर्षों में गांवों में दुग्ध सहकारी समितियों का व्यापक नेटवर्क विकसित हुआ है। यदि वर्तमान विनिमय दर के अनुसार लगभग 36 रुपये प्रति लीटर की दर पर उपलब्ध सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी दूध पाउडर घरेलू बाजार में आ गया, तो इससे डेयरी किसानों की आजीविका तबाह हो जाएगी।
यह व्यापार नहीं, साम्राज्यवाद की गुलामी है
कृषि राज्य का विषय है, फिर भी इस समझौते को बंद दरवाजों के पीछे अंतिम रूप दिया जा रहा है और इसकी समय-सीमा अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले चुनावों के हिसाब से तय की जा रही है। “56 इंच के सीने” वाली सरकार दशकों में वाशिंगटन की सबसे आज्ञाकारी सेवक बन गई है। हमारी कृषि और हमारी संप्रभुता 150 वर्षों के किसान विद्रोहों और स्वतंत्रता संघर्ष के जरिए हासिल हुई हैं। भारत के किसान और जनता इस सरकार को इनमें से किसी को भी समर्पण करने की अनुमति नहीं देंगे। सभी मुख्यमंत्रियों को केंद्र सरकार के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज करानी चाहिए।
संयुक्त किसान मोर्चा की प्रमुख मांगें
1. समझौते का पूरा मसौदा सार्वजनिक किया जाए। इसे संसद के समक्ष रखा जाए, राज्य विधानसभाओं में इस पर बहस कराई जाए तथा राज्यों और किसान संगठनों से परामर्श किया जाए।
2. लिंडसे ओ. ग्राहम अधिनियम की धमकी के तहत अमेरिका से बातचीत करने से इनकार किया जाए।
3. कृषि और कृषि उत्पादों पर कोई मुक्त व्यापार नहीं। भारतीय संसद की सहमति के बिना मोदी सरकार द्वारा किए गए सभी मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द किया जाए। दूध, पोल्ट्री, अनाज, दलहन, तिलहन और जीएम उत्पादों पर शून्य आयात शुल्क की कोई रियायत न दी जाए। पशु चारे, सोयाबीन तेल और फलों से संबंधित रियायतें वापस ली जाएं।
4. 500 अरब अमेरिकी डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता रद्द की जाए। अमेरिका से जबरन ऊर्जा खरीदना बंद किया जाए और नीतियां बनाने की प्रक्रिया में रिलायंस की भूमिका का खुलासा किया जाए।
5. स्टारलिंक को दूरसंचार स्पेक्ट्रम न दिया जाए। बीएसएनएल को मजबूत किया जाए।
6. अमेरिका के साथ आगे के सैन्य संबंध रोके जाएं। गुटनिरपेक्षता की विदेश नीति पर वापस लौटा जाए।
7. यूपीआई (UPI) पर लगाया जाने वाला शुल्क पूरी तरह रद्द किया जाए।
8. सी2+50 प्रतिशत के आधार पर एमएसपी की कानूनी गारंटी लागू की जाए। सभी फसलों की सुनिश्चित सरकारी खरीद की व्यवस्था की जाए और 24 सितंबर को खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में की गई कटौती वापस ली जाए।
संयुक्त किसान मोर्चा किसानों और आम जनता से आह्वान करता है कि वे निर्णायक और निरंतर संघर्ष की तैयारियां तेज करें तथा 26 नवंबर 2026 को होने वाले विरोध प्रदर्शन में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करें। किसानों और मेहनतकश जनता के लिए मृत्युदंड समान इस भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते को वापस लेने सहित अन्य मांगों की पूर्ति होने तक संघर्ष जारी रखा जाए।
SKM मजदूरों, खेत मजदूरों, युवाओं, छात्रों, ट्रेड यूनियनों तथा सभी लोकतांत्रिक और देशभक्त ताकतों से अपील करता है कि वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने मोदी सरकार के आत्मसमर्पण का एकजुट होकर विरोध करें। 2020-21 की तरह किसान एक बार फिर समूची मेहनतकश जनता के सक्रिय समर्थन से जीत हासिल करेंगे। भारत के खेत, ईंधन और डिजिटल भुगतान व्यवस्था बिकाऊ नहीं हैं
अमेरिका के लिए तेल, रिलायंस के लिए मुनाफा
भारत ने पांच वर्षों में 500 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 48 लाख करोड़ रुपये) के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान, सोना, प्रौद्योगिकी और कोयला खरीदने का वादा किया है। इससे किसे लाभ होगा? रिलायंस इंडस्ट्रीज टेक्सास में एक नई तेल रिफाइनरी के लिए वित्तपोषण कर रही है, जो केवल अमेरिकी कच्चे तेल पर चलेगी और बीस वर्षों तक अपना पूरा उत्पादन खरीदेगी। श्री रुबियो की जामनगर यात्रा इसी निवेश से जुड़ी है। भारत की विदेश नीति अमेरिकी तेल और अंबानी के रिलायंस समूह के हितों के लिए लिखी जा रही है।
स्टारलिंक: भारत के आसमान पर कब्जे के लिए अरबपतियों की लड़ाई
अमेरिकी सैन्य आपूर्तिकर्ता कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के मालिक एलन मस्क खुले तौर पर स्टारलिंक को भारत में प्रवेश दिलाने के लिए दबाव बना रहे हैं। उन्होंने यहां तक पूछा है कि क्या मुकेश अंबानी “भारत के असली मालिक” हैं। उपग्रह संचार के लिए स्पेक्ट्रम देश की संपत्ति है। इसे न तो व्यापारिक सौदे के पुरस्कार के रूप में किसी अमेरिकी सैन्य ठेकेदार को दिया जाना चाहिए और न ही किसी निजी एकाधिकार के हवाले किया जाना चाहिए। भारत सरकार को बीएसएनएल को मजबूत करके गांव-गांव तक इंटरनेट पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
हथियारों के सौदे और युद्ध गठबंधन
सैन्य अधीनता की ओर: अक्टूबर 2025 में दस वर्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर, अमेरिकी सेनाओं के साथ रिकॉर्ड संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा अमेरिका से जेवलिन मिसाइलों और एमक्यू-9बी ड्रोन की खरीद, जबकि अमेरिका ईरान के खिलाफ युद्ध कर रहा है—ये सभी कदम गुटनिरपेक्षता की नीति के साथ विश्वासघात हैं। अमेरिकी हथियारों पर खर्च किया जाने वाला हर रुपया सिंचाई, फसल खरीद और ग्रामीण रोजगार सृजन में संभावित सार्वजनिक निवेश से छीना गया रुपया है।
यूपीआई: हर दुकानदार पर शुल्क का बोझ
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर दुकानदारों के लिए 0.4 प्रतिशत शुल्क की घोषणा की थी। व्यापारियों के विरोध के बाद इसे रद्द करने के बजाय केवल दिवाली के बाद तक टाल दिया गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए “समान अवसर” की मांग की थी। वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फोनपे (PhonePe) और गूगल पे (Google Pay), जिनके माध्यम से यूपीआई के 80 प्रतिशत से अधिक भुगतान होते हैं, इससे लाभ उठा सकती हैं। सार्वजनिक धन से विकसित यूपीआई को अमेरिकी कंपनियों के हितों की पूर्ति के लिए मोड़ा जा रहा है।
