शुरुआती लक्षणों को न समझें बुढ़ापे का असर, जागरूकता ही है बचाव का रास्ता
न्यूज़ डेस्क, 21 सितंबर 2026
स्मृतिभ्रंश (डिमेंशिया) और अल्जाइमर रोग को लेकर देश में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लगभग 88 लाख बुजुर्ग डिमेंशिया से पीड़ित हैं। इस आयु वर्ग में इसकी व्यापकता दर करीब 7.4 प्रतिशत है। बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के साथ ही यह संख्या तेजी से बढ़ रही है, और अल्जाइमर इस स्थिति का सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरा है।
क्या है अल्जाइमर और यह कैसे प्रभावित करता है?
अल्जाइमर रोग एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क में अमाइलॉइड प्लाक और न्यूरोफिब्रिलरी टेंगल्स के रूप में प्रोटीन जमने लगते हैं। समय बीतने के साथ मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और दिमाग सिकुड़ने लगता है।
इस बीमारी के शुरुआती चरण में व्यक्ति हाल ही में हुई बातचीत या घटनाओं को भूलने लगता है। एडवांस स्टेज में पहुंचने पर मरीज की सोचने-समझने की क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है और वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। इस स्थिति में डिहाइड्रेशन, खराब न्यूट्रिशन और इन्फेक्शन जैसी जटिलताएं पैदा हो जाती हैं, जो मरीज की मृत्यु का कारण भी बन सकती हैं।
जागरूकता की कमी और सामाजिक झिझक है बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में इस बीमारी का समय पर पता न चल पाने की सबसे बड़ी वजह जागरूकता की कमी और सामाजिक शर्म (स्टिग्मा) है।
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बुढ़ापे का सामान्य हिस्सा समझना: लोग अक्सर बार-बार रास्ता भूलना, दवाइयों या पैसों के हिसाब में भ्रमित होना और व्यवहार में बड़े बदलावों को सामान्य बुढ़ापा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
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सामाजिक झिझक: सामाजिक आलोचना के डर या जानकारी के अभाव में परिवार तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक मरीज की हालत गंभीर न हो जाए।
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स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी: न्यूरोलॉजिस्ट, जेरियाट्रिशियन (वृद्धजन विशेषज्ञ) और मेमोरी क्लीनिक जैसी विशेष सुविधाएं मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित हैं। ग्रामीण और छोटे कस्बों के मरीजों के लिए यात्रा का खर्च और लंबा इंतजार इलाज में बाधा बनता है।
सही समय पर पहचान और समाधान
हालांकि अल्जाइमर का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन समय रहते सही दवाओं और थेरेपी के जरिए इसके लक्षणों की गति को धीमा किया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाना आवश्यक है:
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स्थानीय जागरूकता अभियान: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामाजिक संगठनों के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
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हेल्थकेयर वर्क्स की ट्रेनिंग: प्राथमिक देखभाल डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को दिमागी क्षमता में होने वाले शुरुआती बदलावों को पहचानने की विशेष ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
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टेलीमेडिसिन का उपयोग: दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञों की सलाह पहुँचाने के लिए टेलीमेडिसिन और आउटरीच क्लीनिक का दायरा बढ़ाया जाए।
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परिवार की सजगता: यदि परिवार के किसी बुजुर्ग के व्यवहार या याददाश्त में लगातार गिरावट दिख रही हो, तो बिना समय गंवाए विशेषज्ञ से परामर्श लें।
अल्जाइमर का शुरुआती चरण में पता लगाना केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मरीज को गरिमापूर्ण जीवन देने और उनके परिवारों को मानसिक व आर्थिक रूप से तैयार करने की सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई स्वास्थ्य संबंधी जानकारी केवल जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या लक्षण दिखने पर अपने डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।)
