पटना, 29/11/2025
विधानसभा में प्रचंड जीत के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी एनडीए की सरकार ने नौकरी और रोजगार को लेकर बड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं. एनडीए के घोषणा पत्र में 25 संकल्प लिया गया. अब उसको जमीन पर उतारने की कवायद भी शुरू हो गई है और उसी के तहत 9 पुरानी चीनी मिल को फिर से शुरू करने और 25 नई चीनी मिल खोलने का कैबिनेट में फैसला लिया गया है.
ब्रिटिश काल में खूब चमकी चीनी मिलें
बिहार में बिट्रिश काल में चीनी मिलें खूब फली-फूली. चीनी मिल बिहार में लगाने के पीछे बड़ा कारण गन्ना उत्पादन के लिए गंगेटिक इलाके में उपयुक्त जमीन होना था, जिसे बिट्रिश शासन ने पहचाना. बिहार में एक समय नील की खेती बहुत होती थी लेकिन उसके खिलाफ विरोध शुरू हो गया और ब्रिटिश को नील की खेती की जगह गन्ना की खेती के लिये मंजूरी देनी पड़ी.
चीनी मिल शुरू होने की कहानी
बिहार में चीनी मिल शुरू होने की भी कहानी है. उत्तर बिहार के बड़े इलाके में 1972 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक प्रतिनिधिमंडल भेज कर रिपोर्ट तैयार करवाया था. लुटियन जेपी टशन ने अपनी रिपोर्ट में बिहार की जमीन गन्ना उत्पादन के लिए उपयुक्त बताया था. गन्ना का उत्पादन होने से ब्रिटिश को दो फायदे हुए चीनी मिल की स्थापना के बाद एक तो बिहार से चीनी का विदेश निर्यात होने लगा और नील की खेती का जो विरोध हो रहा था, वह भी समाप्त हो गया.
कभी थीं 33 चीनी मिलें
1947 तक बिहार में 33 चीनी मिलें थीं, जो देश के कुल उत्पादन का 40% योगदान देती थीं. प्रमुख मिलें 1914-1930 के बीच स्थापित हुईं. आज बिहार चीनी उत्पादन में देश का 5% से भी कम योगदान देता है. अभी गन्ना के कुल उत्पादन के 70% चीनी मिलों को बेचा जाता है. 20% इथेनॉल फैक्ट्री में उपयोग होता है. 10% गन्ना गुड और अन्य उत्पादों में खपत होता है.
चीनी मिल खोलना संभव
बीआईए के पूर्व अध्यक्ष केपीएस केसरी का कहना है कि बिहार में गन्ना उत्पादन के लिए उपयुक्त जमीन होना और केन्या से चीनी मिल की मशीन ब्रिटिश शासन में लाई गई थी. इसके कारण आसानी से कई चीनी मिल की स्थापना हुई. लेकिन बाद में बिहार की चीनी मिल बंद होने लगे. आज तो 5% के आसपास ही बिहार का देश के चीनी उत्पादन में योगदान है लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं है. यदि सरकार ने फैसला लिया है तो पुरानी चीनी मिलों को खोला जा सकता है.
बीआईए के पूर्व अध्यक्ष केपीएस केसरी का बयान
“वहां जमीन उपलब्ध है लेकिन कई पुरानी चीनी मिलों का जमीन बियाडा को दे दिया गया है और उनकी मशीन भी पुरानी हो चुकी है. अब नई मशीन लगानी पड़ेगी और जहां तक नई चीनी मिलों की बात है तो उसे लगाया जा सकता है. अब चीनी मिल सिर्फ चीनी का उत्पादन नहीं करती है, बल्कि ऊर्जा और अल्कोहल जैसे प्रोडक्ट का भी उत्पादन होता है जिसकी बहुत मांग है.”- केपीएस केसरी, पूर्व अध्यक्ष, बीआईए
रिसर्च की पड़ेगी जरूरत
केपीएस केसरी ने आगे कहा कि गन्ना को लेकर रिसर्च करना होगा. अभी गन्ना उत्पादन का जो साइकिल है वह काफी लंबा है, 10 महीने का है. उसे कैसे कम किया जा सकता है इसपर रिसर्च की जरूरत है, क्योंकि किसान उस तरह के फसल उत्पादन करना चाहते हैं जिसमें उन्हें अधिक लाभ हो.
रोजगार के बढ़ेंगे अवसर
यदि इसका साइकिल कम कर दिया गया और साल में दो प्रोडक्ट गन्ना का होने लगे तो किसानों को इसका लाभ मिलेगा. उद्योगपति केपीएस केसरी का अभी कहना है की एक चीनी मिल में 4000 लोगों को रोजगार मिल सकता है. उस हिसाब से रोजगार देने में चीनी मिल बहुत ही सहायक होगा.
बिहार में बंद चीनी मिल जिसे खोला जाएगा
जिन बंद चीनी मिलों को फिर से चालू करने की योजना है उसमें से ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन की बंद चीनी मिलें भी हैं. पूर्वी चंपारण चकिया के बारा कावनपुर शुगर मिल को खोलना है, जो 1994-95 में बंद हो गई थी. 1994-95 में बंद पश्चिम चंपारण के चनपटिया कावनपुर शुगर मिल और 1997- 98 में बंद सारण के मढ़ौरा के कावनपुर शुगर मिल को भी खोला जाएगा.
इन चीनी मिल को खोलेगी सरकार
बिहार चीनी निगम की बंद मिलों को भी खोलने की योजना है, इसके तहत चार मिले हैं. 1993- 94 में बंद हुई दरभंगा रैयाम चीनी मिल, 1996- 97 में बंद दरभंगा सकरी चीनी मिल, 1996 -97 में बंद समस्तीपुर चीनी मिल और 1996 -97 में बंद हुई मुजफ्फरपुर मोतीपुर चीनी मिल को भी फिर से सरकार चालू करेगी.
निजी क्षेत्र की बंद चीनी मिलें
निजी क्षेत्र की दो चीनी मिलों को भी चालू किया जाएगा. 2013-14 में बंद श्री हनुमान शुगर मिल और 2021-22 में बंद हुई सासामुसा शुगर मिल को भी पुनर्जीवित किया जाएगा.
मढ़ौरा का कावनपुर शुगर मिल
सारण के मढ़ौरा का कावनपुर शुगर मिल बिहार का पहला चीनी मिल था, जो 28 साल पहले 1997- 98 में बंद हो गया. ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) ग्रुप का चीनी मिल था. ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन ग्रुप की तीन चीनी मिल बिहार में थी, जिसमें से कावनपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड मढ़ौरा, कावनपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड बारा चकिया, पूर्वी चंपारण और कावनपुर सूगर वर्क्स लिमिटेड चनपटिया पश्चिम चंपारण शामिल है.
सात अन्य चीनी मिल जो बंद पड़े हैं, उसमें कई तरह के विवाद हैं. फिर से शुरू करने के लिए जमीन से लेकर तमाम विवादों का निपटारा करना होगा.
दरभंगा राज का चीनी मिल
1980 से पहले 28 से अधिक चीनी मिलें बिहार में चल रही थीं. मधुबनी का लोहट चीनी मिल 1914 में अंग्रेज के समय स्थापित किया गया था. लोहत चीनी मिल 225 एकड़ की भूमि में दरभंगा राज के दरभंगा शुगर कंपनी ने स्थापित किया था. लोहट चीनी मिल का 150 एकड़ में कृषि फार्म और 75 एकड़ में कारखाना था ढुलाई के लिए पंडोल स्टेशन से लेकर लोहट चीनी मिल के अंदर तक रेलवे लाइन बिछाई गई थी.
घाटे के बाद लटका ताला, बेच दी गई मशीनें
यहां 1250 स्थाई 500 से अधिक अस्थाई मजदूर काम करते थे. अधिकारियों के लिए आवास की भी व्यवस्था थी. 1974 में बिहार स्टेट शुगर कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थापना हुई. ताकि चीनी मिलों को चलाया जा सके लेकिन घाटा बढ़ने के बाद 1996 में लोहट चीनी मिल को भी बंद कर दिया गया है. 2022 में चीनी मिल की जो मशीन थी, कोलकाता की कंपनी बीबीएस इंफोमकान प्राइवेट लिमिटेड को 24 करोड़ में बेच दी गयी. 1917 में मिल के अंदर रखे गए रेल इंजन को रेलवे यहां से ले जाकर दरभंगा स्टेशन के सामने सजा कर रखा है.
चीनी मिल खोलने में कई चुनौतियां
वरिष्ठ पत्रकार भोलानाथ का कहना है चीनी मिल खोलने का सरकार ने फैसला लिया है. बड़ा फैसला है लेकिन कई तरह की चुनौतियां हैं. विशेषकर किसान गन्ना की जगह दूसरे फसल का उत्पादन करने लगे हैं. ऐसे में किसानों को गन्ना की फसल उत्पादन करने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं होगा.
नई चीनी मिल के लिए जमीन अधिग्रहण करना भी बड़ी चुनौती होगी !
“गन्ना उत्पादक किसान सही समय पर गन्ना के फसल का मूल्य नहीं मिलने के कारण वर्षों तक आंदोलन करते रहे हैं. इसके अलावा नई चीनी मिल के लिए जमीन अधिग्रहण करना भी बड़ी चुनौती होगी. पुरानी चीनी मिल के पास जमीन है, लेकिन उस पर भी अतिक्रमण है और कई तरह के विवाद हैं. उससे भी निपटारा करना होगा.”
बिहार राज्य चीनी निगम का कार्यकलाप
बिहार राज्य चीनी निगम की स्थापना 28 दिसंबर 1974 को हुई थी. इसका उद्देश्य रुग्ण और बंद पड़ी चीनी मिलों का संचालन करना और उन्हें पुनर्जीवित करना था. शुगर केन अंडरटेकिंग एक्ट 1976 और बिहार राज्य चीनी उपक्रम अध्यादेश 1985 के अंतर्गत 15 बंद चीनी मिलों लोहट, सकरी, समस्तीपुर, गरौल, बनमनखी, वारसलीगंज, बिहटा, गुरारू, न्यू सावन, मोतीपुर, मीरगंज हथुहा, सिवान, लोरिया और सुगौली इकाई का अधिग्रहण किया गया.
बियाडा को दे दी गई जमीन
2006 में नीतीश सरकार ने निविदा प्रक्रिया के माध्यम से निवेशकों को लीज के आधार पर चीनी मिलों के हस्तांतरण का फैसला लिया, लेकिन वह भी कारगर नहीं हुआ. चीनी मिलों की जमीन बियाडा को दे दी गई.
मुख्य सचिव की रिपोर्ट पर होगा तेजी से काम
नीतीश सरकार ने पहली कैबिनेट में चीनी मिल खोलने और पुरानी चीनी मिल को फिर से शुरू करने का फैसला लिया है. इसपर गन्ना उद्योग मंत्री संजय कुमार ने कहा की चीनी मिलों को लेकर कैबिनेट में जो फैसला लिया गया है, उसको लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है.
हम लोग उसपर तेजी से काम करेंगे: संजय कुमार,गन्ना उद्योग मंत्री, बिहार
“कमेटी की रिपोर्ट मिलने के बाद हमलोग उसपर तेजी से काम करेंगे. हम लोगों का संकल्प ही है कि बिहार में एक करोड़ नौकरी रोजगार देने का. चीनी मिल उसमें बड़ी भूमिका निभाएगी. बिहार जो एक समय चीनी मिल और चीनी उत्पादन के लिए पूरे देश में सबसे आगे था, एक बार फिर से हम लोग इसे प्रमुख स्थान दिलाएंगे.”- संजय कुमार,गन्ना उद्योग मंत्री, बिहार
कांग्रेस शासन में ही बंद होने लगी चीनी मिल
कांग्रेस के शासन से लेकर नीतीश कुमार के शासन तक देखें तो मुख्यमंत्री ने कई बार वादा किया. घोषणा पत्र में भी चीनी मिल खोलने की बात कही गई, लेकिन हकीकत में बंद पड़ी चीनी मिले खुली नहीं हैं. 1952 के चुनावों के बाद श्रीकृष्ण सिंह की कांग्रेस सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक में कहा था कि बिहार के गंगेटिक मैदानों में गन्ना उत्पादन बढ़ाकर चीनी मिलों का नेटवर्क विकसित किया जाएगा, जहां 5-वर्षीय योजना के तहत औद्योगिक विकास पर जोर दिया जाएगा. लेकिन हकीकत में चीनी मिल बंद होने शुरू हो गये.
1970 तक 10 से ज्यादा मिलें बंद
1967 में सीएम महामाय प्रसाद सिन्हा ने भी वादा किया था, बंद पड़ रही मिलों को दोबारा शुरू करने के लिए केंद्र से मदद ली जाएगी. गन्ना किसानों को न्यूयनतम समर्थन मूल्य मिलेगा. 1967 के घोषणापत्र का हिस्सा था, जहां 21 मिलों के संरक्षण का वादा किया गया. 1967 के बाद मिलें बढ़ीं, लेकिन चीनी की कीमतों में गिरावट की वजह से 1970 तक 10 से ज्यादा मिलें बंद हो गईं.
सरकारें नहीं खोल सकी चीनी मिलें!
1977 के चुनावों में जनता पार्टी की सरकार बनी और जनता पार्टी की सरकार में चीनी मिलों का अधिग्रहण शुरू हुआ. लेकिन इससे घाटा बढ़ा. जून 1977 में पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर ने कहा था कि 15 से ज्यादा प्राइवेट मिलों का सरकारी अधिग्रहण कर दोबारा शुरू किया जाएगा. किसानों को समय पर पेमेंट मिलेगी और रोजगार बढ़ेगा. 1977-1985 तक समस्तीपुर और रैयाम जैसी 15 मिलों का अधिग्रहण हुआ, लेकिन सभी घाटे में रहीं. 1990 तक ज्यादातर बंद हो गईं.
1990 तक 20 चीनी मिलें बंद
1980 के दशक में 28 मिलें कार्यरत थीं, लेकिन 1990 तक 20 बंद हो गईं. फरवरी 1990 को पटना में पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव ने बयान दिया, 28 मिलों का सरकारीकरण कर दोबारा शुरू किया जाएगा. किसानों को 20% ज्यादा मूल्य मिलेगा. लेकिन अगले 15 सालों में भ्रष्टाचार और फंड की कमी की वजह से कोई नतीजा नहीं निकला.
RJD सरकार में चीनी मिलों की स्थिति और खराब हुई
अक्टूबर 2000 में सिवान में पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने चुनावी रैली में कहा था, “सिवान और सारण की मिलों में दोबारा शुरू किया जाएगा, जिससे मजदूरों का पलायन रुकेगा.” लेकिन 1997 में मढ़ौरा मिल बंद हो गया. अक्टूबर 2005 में लालू प्रसाद यादव ने फिर कहा, “राजद के सत्ता में आते ही मढ़ौरा और सीवान मिलों को पुनर्जीवित किया जाएगा.” लेकिन उसके बाद राजद का शासन नहीं आया नीतीश कुमार सत्ता में आ गए.
नीतीश के ऐलान के बाद भी मोतिहारी मिल में सन्नाटा
नीतीश कुमार के 20 साल के शासन में कुछ चीनी मिल तो शुरू हुई, लेकिन अधिकांश बंद चीनी मिल शुरू नहीं हो सके. नवंबर 2005 में पटना में नीतीश कुमार ने कहा था, मोतिहारी समेत सभी बंद मिलों को दोबारा खोला जाएगा. सरकार बनी, जिसके बाद बिहार गन्ना विभाग बनाया और सलाहकार की नियुक्ति भी हुई, लेकिन मोतिहारी मिल बंद ही रही.
वादों के बाद भी नतीजा जीरो
अक्टूबर 2010 में समस्तीपुर में सीएम नीतीश कुमार ने कहा था, 15 सरकारी मिलों का विकास होगा. यह वादा NDA के घोषणापत्र में भी था. लेकिन 15 सालों में कोई नई मिल शुरू नहीं हुई. अक्टूबर 2015 में दरभंगा में चुनाव अभियान में नीतीश ने फिर कहा, ‘सकरी और रैयाम मिलों का विकास होगा, जिससे 1 लाख किसानों को फायदा पहुंचेगा. इस बार यह वादा महागठबंधन के घोषणापत्र में था. लेकिन 2015-2017 के बीच कोई विकास नहीं किया गया.
एक बार फिर से नीतीश ने किया वादा
उसके बाद भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा चीनी मिलों के विकास की बात कही गई और अब तो नौ पुरानी बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने और 25 नई खोलने की बात कही गई है. अब देखना है सरकार इसमें कितना सफल होती है फिलहाल मुख्य सचिव की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की कमेटी बनाई गई है जो अपनी रिपोर्ट देगी.
चीनी मिल को लेकर सियासत
चुनाव के समय चीनी मिल्स बंद होने पर प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री ने चीनी मिल बंद होने पर कांग्रेस से लेकर लालू राज को जिम्मेवार ठहराया था. 1 नवंबर 2025 को गोपालगंज में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि रीगा मिल चालू होगी और अगले 5 सालों में सभी बंद मिलें भी खुल जाएंगी.
चुनाव के समय तेजस्वी यादव ने भी वादा किया था
चुनाव के समय तेजस्वी यादव ने भी वादा किया था कि सरकार बनी तो 20 महीने में रैयाम चीनी मिल को चालू करूंगा. तेजस्वी यादव प्रधानमंत्री पर चीनी मिल को लेकर निशाना भी साधते रहे हैं. चुनाव के दौरान मोतिहारी में जब प्रधानमंत्री की रैली थी तो उस समय तेजस्वी ने कहा कि 11 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोतिहारी में चीनी मिल शुरू करने और उसकी चीनी से ही चाय पीने की बात कही थी. वह वादा 11 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ.
बिहार में अभी चल रही 9 मिल
देश में 2024-25 में 250 लाख टन के करीब चीनी का उत्पादन हुआ है और उसमें 5 % से भी कम बिहार का उत्पादन है. उत्तर प्रदेश 87.50 लाख टन, महाराष्ट्र 80.06 लाख टन, कर्नाटक 39.5 लाख टन और बिहार का उत्पादन 7 लाख टन के आसपास है. बिहार में 9 चीनी मील अभी काम कर रही हैं, जो चंपारण, गोपालगंज और समस्तीपुर इलाके में हैं. बिहार सरकार के नए फैसले से जिसे चीनी क्षेत्र में नहीं उम्मीद जगी है.
