नई दिल्ली, 14/01/2026
शक्सगाम घाटी कभी जम्मू कश्मीर का हिस्सा हुआ करता था. लेकिन आजादी के बाद जब पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला किया, उसने इसका हिस्सा भी अपने कब्जे में कर लिया. उसके कब्जे वाले भाग में शक्सगाम घाटी भी शामिल है.
विवाद सिर्फ इतना भर नहीं है. पाकिस्तान ने एक और कुत्सित चाल चल दी. उसने 1963 में शक्सगाम घाटी को चीन के हवाले कर दिया, जबकि यह भारत का हिस्सा है. पाकिस्तान ने यह सबकुछ चीन को खुश करने के लिए किया. उसे भारत के खिलाफ चीन का समर्थन चाहिए था, लिहाजा उसने इस तरह का कदम उठाया. 1963 से पहले 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था और पाकिस्तान ने इस मौके का फायदा उठाया. हालांकि, भारत ने कभी भी चीन और पाकिस्तान के इस समझौते को मान्यता नहीं दी. आपको बता दें कि शक्सगाम घाटी का क्षेत्रफल 5180 वर्ग किलोमीटर है. यह सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर काराकोरम माउंटेन रेंज के पास है. रणनीतिक रूप से यह काफी अहम है.
अब चीन इस हिस्से में निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ा रहा है. वह यहां पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दे रहा है. चीन ने इसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का एक भाग घोषित किया है. इस पर भारत ने आपत्ति जताई है. भारत ने साफ कर दिया है कि यह उसका इलाका है और पाकिस्तान को कोई भी अधिकार नहीं है, कि वह यहां की जमीन को किसी तीसरे देश को सौंप सके. भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने कहा कि यह भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है और चीन का प्रोजेक्ट पीओके वाले इलाके से गुजरता है. भारत शुरू से ही कहता रहा है कि पीओके उसका इलाका है, लिहाजा इस पर सिर्फ भारत का ही हक है.
तत्काल विवाद की वजह चीन द्वारा इस क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य है. चीन यहां पर ऑल वेदर रोड बना रहा है. जानकारी के अनुसार चीन ने 75 किलोमीटर सड़क पूरी कर ली है. जैसे ही यह जानकारी सामने आई, भारत ने आपत्ति जताई. उसने कहा कि अगर चीन आगे भी इस इलाके में रोड का निर्माण करता रहा, तो चीन और भारत के बीच संबंधों में तनाव बढ़ सकता है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 1963 का पाकिस्तान और चीन का समझौता भारत के नजरिए से अमान्य है, शक्सगाम घाटी भारत का क्षेत्र है. भारत ने कहा कि पूरा जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है और शक्सगाम भी उसी का एक भाग है, इसलिए इसे अलग से देखने की कोई जरूरत नहीं है. एक दिन पहले मंगलवार को सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ने भी इसका जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जब भारत 1963 के समझौते को मानता ही नहीं है, तो यहां पर निर्माण कार्य को मान्यता किस तरह से दी जा सकती है.
भारत ने अपने बयान में कहा, “शक्सगाम घाटी में जमीनी हालात बदलने की किसी भी कोशिश के खिलाफ भारत ने चीन के समक्ष लगातार विरोध दर्ज कराया है. भारत अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है.”
शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है. हमने 1963 में किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है. हम लगातार कहते आए हैं कि यह समझौता अवैध और अमान्य है. हम तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को भी मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसपर पाकिस्तान का अवैध और जबरन कब्जा है. पूरा जम्मू कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा हैं. यह बात पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार स्पष्ट रूप से बता दी गई है…रणधीर जायसवाल, भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता
जैसे ही भारत ने चीन द्वारा सड़क निर्माण का विरोध किया, चीन के विदेश मंत्रालय ने इसका जवाब दिया. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जिस इलाके को लेकर भारत ने आपत्ति दर्ज कराई है, वह चीन का हिस्सा है. प्रवक्ता ने कहा कि चीन अपने क्षेत्र में निर्माण कार्य कर रहा है और उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार है. चीनी प्रवक्ता ने कहा कि चीन जो भी कुछ कर रहा है, उसकी पृष्ठभूमि पाकिस्तान और चीन का समझौता है और चीन बीआरआई प्रोजेक्ट को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि उनका मकसद यहां पर बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना है, ताकि व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके. चीनी प्रवक्ता ने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर विवादास्पद क्षेत्र है और इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत ही सुलझाया जाना चाहिए.
सबसे पहले तो जिस क्षेत्र का आप उल्लेख कर रहे हैं, वह चीन का हिस्सा है. अपने ही क्षेत्र में चीन की बुनियादी ढांचा गतिविधियां बिल्कुल उचित हैं. चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में सीमा समझौता किया था और दोनों देशों के बीच सीमा तय की गई थी. यह संप्रभु देशों के रूप में चीन और पाकिस्तान का अधिकार है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) एक आर्थिक पहल है, जिसका उद्देश्य स्थानीय आर्थिक व सामाजिक विकास करना और लोगों की जीवन में सुधार लाना है… माओ निंग, चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता
शक्सगाम इलाका काफी दुर्गम है. यहां पर आवास नहीं किया जा सकता है. बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में 1926 में प्रकाशित एक्सप्लोरेशन ऑफ द शक्सगाम वैली एंड अगिल रेंज का हवाला देकर बताया है कि यहां से कोई राहगीर गुजर तो सकता है, लेकिन किसी के लिए यहां पर बसना संभव नहीं है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि शक्सगाम घाटी मध्य एशिया और इंडियन सबकॉन्टिनेंट की जल प्रणालियों को विभाजित करता है. यानी यहां से दक्षिण में सिंधु नदी बहती है, जबकि उत्तर में यारकंद नदी प्रवाहित होती है. चीन इस एरिया को ट्रांस काराकोरम ट्रेक्ट कहता है. उसने इसे शिनजियांग वीगर का ऑटोनोमस रीजन माना है.
रक्षा क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि दुर्गम इलाका होने के बावजूद भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है. उनके अनुसार जिसने भी इस इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर लिया, उस् काराकोरम, सियाचिन और शिनजियांग इलाके में एडवांटेज मिल सकता है, और जिस तरह की स्थिति ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बनी थी, अगर युद्ध का दायर बढ़ता, तो कुछ और भी हो सकता था. इसलिए भारत को बहुत अधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है.
भाजपा के वरिष्ठ नेता और मशहूर वकील महेश जेठमलानी ने कहा, “एक बार फिर उकसावा. यही उनका तरीका है. डिप्लोमेसी की आड़ में गैर-कानूनी काम करना चीनियों के लिए कोई नई बात नहीं है. शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को चीन का खारिज करना बीजिंग का पुराना तरीका है. पहले कब्जा करो, बाद में सफाई दो. पाकिस्तान के साथ एक तथाकथित सीमा समझौता, उस जमीन पर जिसका पाकिस्तान कभी मालिक नहीं था, उसे वैधता के तौर पर दिखाया जा रहा है. भारत हमेशा से साफ रहा है- शक्सगाम घाटी, 5,180 वर्ग किलोमीटर का इलाका, ऐतिहासिक रूप से जम्मू और कश्मीर का हिस्सा है.यह नक्शे की बात नहीं है. यह चरित्र की बात है.”
ललद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने क्या कहा
“पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का पूरा क्षेत्र भारत का है. ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए जो भड़काऊ प्रकृति के हों. 1994 का एक संसदीय प्रस्ताव है जो स्पष्ट रूप से कहता है कि पूरा पीओके भारत का है. किसी भी विस्तारवादी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हमें नहीं पता कि पाकिस्तान ने चीन के साथ क्या सौदा किया है. चीन को यह समझना चाहिए कि उसकी विस्तारवादी नीति से कुछ भी हासिल नहीं होगा. यह 1962 का भारत नहीं, 2026 का भारत है. ऐसे किसी भी प्रयास को विफल कर दिया जाएगा. चीन ने पूर्व में अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों पर भी दावा किया था.”
