गाजियाबाद, 18/12/2025
मिल्कवीड अब कीमती जैविक संसाधन के रूप में उभर रहा है. इसे लेकर गाजियाबाद स्थित NITRA (नॉर्दन इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन) 20 सालों से मिल्कवीड पर काम कर रहा है. इसे भारत का हरा सोना भी कहा जाता है. मिल्कवीड के रेशों (फ्लॉस) में प्राकृतिक थर्मल इंसुलेशन, लाइटवेट और जल रोधी गुण होते हैं, जो इसे स्लीपिंग बैग, जैकेट, हम इंसुलेशन और तकनीकी वेस्टन के लिए बेहतरीन विकल्प बनाते हैं. मौजूदा दौर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सस्टेनेबल टेक्सटाइल की डिमांड तेजी के साथ बड़ी है. मिल्कवीड आधारित उत्पादों को, अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे बाजारों में भेजने की रणनीति पर काम किया जा रहा है.
क्या है मिल्कवीड
NITRA के डायरेक्टर जनरल एमएस परमार ने बताया कि सामान्य भाषा में आक के पौधे को मिल्कवीड कहते हैं. मिल्कवीड फ्लॉस और फाइबर को मिल्कवीड वृक्ष से प्राप्त फल (Pod) से निकाला जाता है. मिल्कवीड को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अनंतमूल, मंदार, अकौआ आदि नाम से जाना जाता है. इसका वानस्पतिक नाम Calotropis Gigantea है. मिल्कवीड वृक्ष का हिंदू धर्म में भी विशेष महत्व है. शिव पुराण के मुताबिक, भगवान शिव को मंदार के फूल या माला अति प्रिय है. भारतीय ज्योतिष में नौ प्रमुख वृक्षों (नवग्रह वृक्ष) के बारे में बताया गया है. मिल्कवीड वृक्ष को सप्तपर्णी वृक्ष भी कहा जाता है, जिसे सूर्य ग्रह से संबंधित माना जाता है.
10 साल तक दे सकता है फसल
जलवायु में होने वाले परिवर्तन का मिल्कवीड के वृक्ष पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है. मिल्कवीड का वृक्ष Tropical Regions में अधिक पाया जाता है. इसके विभिन्न हिस्सों में कई प्रकार के औषधीय गुण पाए जाते हैं. एस्ट्रोजन प्रभाव, सूजन रोधी प्रभाव, एंटीबैक्टीरियल गुण और दर्द निवारक गुण शामिल हैं. यह बहुवर्षीय वृक्ष है जो एक बार लगाने पर 10 साल तक फसल दे सकता है.
कम पानी की खपत
मिल्कवीड सस्टेनेबल फाइबर है. कपास की तुलना में मिल्कवीड की खेती में काफी कम पानी की खपत होती है. साथ ही उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग भी काफी कम होता है. इससे निकला हुआ रेशा हल्का और ज्यादा गर्मी देने वाला होता है, जिसका उपयोग अत्यधिक ठंडे इलाकों (करीब-20 डिग्री सेल्सियस) में पहने जाने वाले कपड़ों को बनाने के लिए किया जाता है. इसके रेशे को कॉटन, सिल्क, ऊन और पॉलिएस्टर आदि के रेशों के साथ मिश्रित कर धागा बनाया जाता है, जिसके बाद इस धागे से कपड़े बनाए जाते हैं.
NITRA और मिल्कवीड का संयोग
पिछले 20 वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों से NITRA मिल्कवीड के रेशों को इकट्ठा कर के कपड़ों में मिल्कवीड फ्लॉस और फाइबर के एप्लीकेशन पर काम कर रहा है. NITRA ने मिल्कवीड के रेशों का इस्तेमाल कर विभिन्न अत्यधिक ठंडी जलवायु वाले टेक्सटाइल प्रोडक्ट डेवलप किए हैं. इसमें स्लीपिंग बैग, जैकेट, कंफर्टर, तकिया आदि भी शामिल. इसके अलावा मिल्कवीड रेशों को को कपास पॉलिएस्टर, रेशम, ऊन आदि के साथ मिश्रित कर विभिन्न प्रकार के कपड़े भी डेवलप किए गए हैं.
ऐसे किया जाता था मिल्कवीड का पारंपरिक उपयोग
मिल्कवीड के पौधे को औषधि के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता रहा है. पहले शरीर में सूजन वाले स्थान पर मिल्कवीड के पौधे के पत्तों को गर्म कर लगाया जाता था. लेकिन, बदलते वक्त के साथ मिल्कवीड के पौधे का औषधीय उपयोग कम होता चला गया.
20 साल से चल रहा मिल्कवीड पर काम
NITRA ने तकरीबन 20 साल पहले मिल्कवीड पर काम करना शुरू किया था. यह फाइबर काफी हल्का होता है और मई-जून के महीने में हवा में उड़ने लगता है. इसके हल्के होने के चलते संस्था ने इस फाइबर को टेक्सटाइल में इस्तेमाल करने पर विचार किया. इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के एक्सपेरिमेंट शुरू किए गए. 2022 में अध्ययन के दौरान पता चला कि मिल्कवीड में थर्मल प्रॉपर्टीज पाई जाती हैं.
हवा को अंदर करता है ट्रैप
बताया गया कि मिल्कवीड अंदर से खोखला है और गर्मी पैदा कर सकता है. एक्सपेरिमेंट के दौरान आगे पता चला कि मिल्कवीड अंदर से तकरीबन 70 प्रतिशत तक खोखला है, जिससे कि यह अपने अंदर हवा को ट्रैप कर लेता है. अगर इस फाइबर का इस्तेमाल कर कपड़े तैयार किए जाएं तो अत्यधिक ठंड में भी कपड़े गर्म रहेंगे. शुरुआत में कपड़े तैयार करने के लिए 10 प्रतिशत मिल्कवीड फाइबर का उपयोग किया गया, लेकिन बाद में NITRA ने 60 प्रतिशत मिल्कवीड का इस्तेमाल कर कपड़े तैयार करने की तकनीक विकसित कर ली.
विदेश में पसंद आए मिल्कवीड के उत्पाद
संस्था की ओर से टैक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग से संबंधित कई प्रतिष्ठित कंपनियों को मिल्कवीड के बारे में जानकारी दी गई. कई टैक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों द्वारा मिल्कवीड से तैयार किए गए मफलर, टॉवल, कंफर्टर आदि को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रदर्शनियों में लगाया गया, जहां कंपनियों को कई देशों से उत्पादों के ऑर्डर भी मिले. इसके लिए अब मिल्कवीड फाइबर की आवश्यकता है.
मार्केट में भारी डिमांड
मौजूदा समय में मिल्कवीड की डिमांड काफी ज्यादा है. इसे लेकर गाजियाबाद स्थित संस्था की ओर से मिल्कवीड की डिमांड को पूरा करने के लिए कई राज्यों में ‘पायलट कल्टीवेशन’ की शुरुआत की गई है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि मिल्कवीड की डिमांड के मुताबिक, सप्लाई चेन को मेंटेन किया जा सके. साथ ही किसानों को भी प्रेरित किया जा रहा है कि वे मिल्कवीड की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते हैं.
NITRA खरीदेगा मिल्कवीड
विभिन्न राज्यों में NITRA की ओर से करीब 1200 एकड़ में मिल्कवीड की खेती में सहयोग किया जा रहा है है. संस्था के अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती तीन सालों तक तक के लिए रणनीति बनाई गई है कि जहां-जहां मिल्कवीड की खेती में हम सहयोग कर रहे हैं, वहां होने वाली फसल से निकलने वाले मिल्कवीड के फाइबर को क्रय किया जाएगा. इसे आगे विभिन्न टैक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को सप्लाई किया जाएगा. फिलहाल, मिल्कवीड की खेती अभी स्थापित हो रही है. ऐसे में इस खेती को स्थापित करने के लिए NITRA सहयोग करेगा.
