फिरोजपुर, 03/02/2026
करीब 30 महीनों की अनिश्चितता, भय और यातना के बाद फिरोजपुर सीमा जिले के चार युवक शनिवार देर शाम अपने घर लौट आए। यह वापसी केवल सीमा पार से लौटने की नहीं, बल्कि उन गहरे जख्मों से बाहर आने की कोशिश भी है, जो अगस्त 2023 से पाकिस्तानी जेलों में बिताए गए हर दिन के साथ और गहरे होते चले गए।
घर लौटने वाले युवकों में किलचे गांव के जोगिंदर सिंह उर्फ काला, गुरमेल सिंह, छिंदर सिंह और अली के गांव के विशालजीत सिंह शामिल हैं। इनकी गिरफ्तारी 2023 की भीषण बाढ़ के दौरान हुई थी। सतलुज नदी के किनारे जोगिंदर का ट्रैक्टर पानी में फंस गया था। उसे निकालने के प्रयास में तेज बहाव युवकों को अनजाने में सीमा पार ले गया, जहां पाकिस्तानी रेंजर्स ने उन्हें हिरासत में ले लिया। जोगिंदर सिंह के अनुसार, शुरुआती दिनों में उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर रखा गया और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
करीब एक महीने बाद अदालत में पेशी हुई, जहां उन्हें लाहौर की उच्च सुरक्षा जेल में एक वर्ष की सजा सुनाई गई और दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। जुर्माना अदा न कर पाने के कारण एक माह अतिरिक्त जेल में रहना पड़ा। सजा पूरी होने के बावजूद प्रक्रियात्मक अड़चनों के चलते रिहाई में लगातार देरी होती रही। गुरमेल सिंह के लिए यह कैद केवल जेल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उनकी 82 वर्षीय मां लंबे इंतजार के दौरान आंखों की रोशनी खो बैठीं।
18 वर्षीय बेटा पढ़ाई जारी नहीं रख सका, जबकि छोटे बेटे को सर्जरी से गुजरना पड़ा। उन्होंने बताया कि जेल में सप्ताह में केवल एक बार परिवार से बात करने की अनुमति मिलती थी और छोटी कोठरियों में कई अन्य भारतीय कैदी भी वर्षों से बंद थे।
छिंदर सिंह की पत्नी के अनुसार, लंबे इंतजार और अनिश्चितता ने पूरे परिवार को मानसिक रूप से तोड़ दिया। उनकी बेटी को पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। अब पति की सुरक्षित वापसी के बाद परिवार धार्मिक स्थलों पर जाकर मन्नतें पूरी करने की तैयारी कर रहा है। वहीं विशालजीत सिंह ने बताया कि वह कुछ दिन अपनी मौसी के घर रहेंगे और इस पूरे अनुभव की कड़वी यादों से उबरने की कोशिश करेंगे।
सूत्रों के अनुसार, रिहा किए गए छह भारतीय नागरिकों को पहले अमृतसर स्थित संयुक्त पूछताछ केंद्र में विभिन्न एजेंसियों ने पूछताछ के लिए रोका गया, जिसके बाद उन्हें उनके गांव भेजा गया। हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। सीमा क्षेत्र के इन परिवारों के लिए युवकों की यह वापसी केवल राहत नहीं, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि सीमावर्ती इलाकों में एक छोटी सी दुर्घटना किस तरह वर्षों की पीड़ा, इंतजार और असहायता में बदल सकती है।
